Thursday, April 9, 2020

किसी व्यक्ति की सफलता को देखकर ह्रदय में दुख क्यों उत्पन्न होता है।

जब भी कोई व्यक्ति दूसरों की सफलता को देखकर हृदय में अपने उद्गार उत्पन्न होते हुए आता है तब हम स्वयं को यह समझाते हुए पाते हैं कि वह तो वह है हमें उससे क्या मतलब।
लेकिन क्या यह स्वयं को समझाने के बाद आप शांत हो जाते हैं क्या दूसरों को देखकर मन में जो पीड़ा उत्पन्न हुई है वह शाम तो हो जाती है,नहीं
अगर इस तरह शांत हो जाए तो ,क्या बात थी।
लेकिन मन अपने इस अंतर व्यथा को कभी बाहर प्रेषित करता ही नहीं वह अंदर ही अंदर परेशान और स्वयं को परेशान करता रहता है तथा मानसिक रूप से खुद को एक अंधेरी काली कोठरी में बंद कर लेता है और खुद का विकास रोक देता है।
वह इस भांति हो जाता है जैसे सूरज ढलते ही संसार को अंधेरा अपने बाजुओं में जकड़ लेता है ठीक इसी प्रकार हमारे अंदर घोर अंधकार आ जाता है इससे मुक्ति मनाना मतलब स्वयं पर जीत हासिल करना अगर व्यक्ति सही समय पर स्वयं को न संभाल पाया तो यहीं से हमारे अंदर ईर्ष्या उत्पन्न होती है।
जब व्यक्ति के अंदर एक बार ईर्ष्या का उदय हो जाता है तो इसका अर्थ क्या है कि व्यक्ति अब धीरे-धीरे स्वयं के ऊपर से अपनी पकड़ को होता जा रहा है। अश्व का तभी तक महत्त्व होता है जब तक उसकी लगाम आपके हाथों में हो यदि एक बार लगाम छूट जाती है तो वह अपनेेेेे मन का हो  है। इन परिस्थितियों में जब तक आप स्वयं पर निरंतर नियंत्रण पाने के लिए कार्य नहीं करेंगे तब तक आप घोर अंधकाार में डूबते चले जाते हैं।